Unique Dog Story Rajasthan | merarajasthannews
- वो सुबह जब गांव ने अपना सबसे वफादार साथी खो दिया
- क्यों ‘डॉग-सा’ कहलाता था वह कुत्ता?
- न हिंदू, न मुस्लिम — हर किसी का था ‘डॉग-सा’
- जानवरों में संवेदना — क्या सच में समझते हैं वे इंसानों का दुख?
- मौत के बाद गांव का फैसला — “डॉग-सा को इंसानों जैसी विदाई देंगे”
- अनोखी अंतिम यात्रा — पिकअप वाहन, भजन और राम धुन
- पूरे सम्मान के साथ किया गया अंतिम संस्कार
- सरपंच का बयान — “डॉग-सा गांव की आत्मा था”
- गांव की महिलाओं की आंखों में आंसू, बच्चों के दिल में खालीपन
- हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल बनी यह विदाई
- सोशल मीडिया पर वायरल हुई ‘डॉग-सा’ की कहानी
- मनोवैज्ञानिक नजरिया — जानवर क्यों बन जाते हैं परिवार?
- क्या भारत में जानवरों का इस तरह अंतिम संस्कार आम है?
- पहले भी सामने आ चुकी हैं ऐसी कहानियां, लेकिन यह सबसे खास क्यों?
- डॉग-सा — सिर्फ कुत्ता नहीं, एक भावना
- क्या यह घटना समाज के लिए कोई संदेश देती है?
- निष्कर्ष — जब एक गांव ने अपने सबसे वफादार साथी को विदा किया
राजस्थान के ब्यावर जिले के छोटे से गांव राजियावास में 3 जनवरी की सुबह कुछ अलग थी। सूरज रोज़ की तरह निकला, लेकिन गलियों में दौड़ता-भागता, हर किसी की देहरी पर बैठकर पूंछ हिलाता एक खास सदस्य इस बार दिखाई नहीं दिया। गांव वालों को जैसे ही पता चला कि उनका प्यारा ‘डॉग-सा’ अब नहीं रहा, पूरा गांव शोक में डूब गया।
यह कोई आम कुत्ता नहीं था। यह वह साथी था जो हर हिंदू और मुस्लिम परिवार के दुख में बिना बुलाए पहुंच जाता था। अंतिम यात्राओं में आगे-आगे चलता, श्मशान या कब्रिस्तान तक साथ जाता और फिर कई दिनों तक उसी घर के आसपास मंडराता, मानो उस परिवार के दर्द को समझ रहा हो।
जब उसकी मौत हुई, तो गांव ने तय किया — “डॉग-सा को वही सम्मान मिलेगा, जो किसी अपने को मिलता है।” और फिर जो हुआ, वह राजस्थान ही नहीं, पूरे देश में मानवीय संवेदनाओं की मिसाल बन गया।
वो सुबह जब गांव ने अपना सबसे वफादार साथी खो दिया
3 जनवरी की सुबह कुछ ग्रामीणों ने देखा कि डॉग-सा गांव की एक गली में शांत पड़ा है। न वह उठ रहा था, न ही किसी को देखकर पूंछ हिला रहा था। थोड़ी ही देर में खबर फैल गई — डॉग-सा नहीं रहा।
यह खबर किसी परिवार के बुजुर्ग की मौत जैसी फैल गई। बच्चे रो पड़े, बुजुर्गों की आंखें नम हो गईं, और महिलाएं एक-दूसरे से बस यही कहती रहीं —
“अब गांव सूना लगेगा…”
राजियावास जैसे छोटे गांव में, जहां हर कोई हर किसी को जानता है, वहां डॉग-सा सिर्फ जानवर नहीं, बल्कि गांव की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन चुका था।
क्यों ‘डॉग-सा’ कहलाता था वह कुत्ता?
राजस्थान में किसी के नाम के साथ “-सा” जोड़ना सम्मान और अपनापन दर्शाता है — जैसे रामसा, भैरूंसा, कालूसिंहसा। गांव वालों ने उसी भावना से इस कुत्ते को नाम दिया — ‘डॉग-सा’।
यह नाम अपने आप में एक संदेश था —
“यह हमारा है, हममें से एक है।”
डॉग-सा का कोई मालिक नहीं था, फिर भी पूरा गांव उसका परिवार था।
न हिंदू, न मुस्लिम — हर किसी का था ‘डॉग-सा’
डॉग-सा की सबसे अनोखी बात यह थी कि वह हर अंतिम यात्रा में शामिल होता था — चाहे वह हिंदू परिवार की हो या मुस्लिम परिवार की।
हिंदू परिवारों में
जब गांव में किसी की मृत्यु होती, तो डॉग-सा उस घर के बाहर बैठ जाता। जैसे ही शवयात्रा निकलती, वह सबसे आगे-आगे चलता, श्मशान तक जाता और फिर 12 दिनों तक उसी परिवार के घर के आसपास दिखाई देता।
मुस्लिम परिवारों में
कब्रिस्तान की ओर जाती जनाज़ा यात्रा में भी डॉग-सा पीछे-पीछे चलता। वहां शांत बैठकर दुआओं के दौरान मौजूद रहता।
ग्रामीण कहते हैं —
“हम कभी उसे बुलाते नहीं थे, लेकिन वह हर बार खुद ही आ जाता था। जैसे उसे पता हो कि गांव में दुख है।”
जानवरों में संवेदना — क्या सच में समझते हैं वे इंसानों का दुख?
पशु व्यवहार विशेषज्ञों के अनुसार, कुत्ते इंसानी भावनाओं को बहुत जल्दी पहचान लेते हैं। वे—
- आवाज़ के उतार-चढ़ाव
- चेहरे के भाव
- माहौल के तनाव
से यह समझ जाते हैं कि सामने वाला दुखी है।
डॉग-सा का अंतिम यात्राओं में शामिल होना इसी संवेदनशीलता का प्रमाण था।
मौत के बाद गांव का फैसला — “डॉग-सा को इंसानों जैसी विदाई देंगे”
जब डॉग-सा के निधन की खबर फैली, तो कुछ ही देर में गांव के चौपाल पर चर्चा शुरू हो गई। सरपंच, बुजुर्ग, युवा — सभी एक राय पर पहुंचे —
“जिसने जिंदगी भर हमारे अपनों को अंतिम विदाई दी, उसे भी हम वैसे ही विदा करेंगे।”
किसी ने पैसे जुटाने की जिम्मेदारी ली, किसी ने वाहन की व्यवस्था, किसी ने लकड़ियां और किसी ने अंतिम संस्कार की रस्मों की तैयारी संभाली।
अनोखी अंतिम यात्रा — पिकअप वाहन, भजन और राम धुन
डॉग-सा की पार्थिव देह को एक पिकअप वाहन पर रखा गया। वाहन को फूलों से सजाया गया। सामने डीजे वाहन पर राम धुन और भजन बजाए गए।
करीब 100 ग्रामीण उस वाहन के पीछे पैदल चल पड़े — बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी बुजुर्ग या प्रियजन की अंतिम यात्रा में चला जाता है।
गांव की गलियों में उस दिन सन्नाटा था। कोई हंसी नहीं, कोई बातचीत नहीं — बस आंखों में नमी और दिल में भारीपन।
पूरे सम्मान के साथ किया गया अंतिम संस्कार
डॉग-सा का अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार लकड़ियों पर चिता सजाकर किया गया।
कुछ ग्रामीणों की आंखों से आंसू बह रहे थे। कुछ हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रहे थे। बच्चों ने फूल चढ़ाए। बुजुर्गों ने आशीर्वाद की तरह उसके सिर पर हाथ फेरा — मानो कह रहे हों —
“जा बेटा, जहां भी रहो, खुश रहो।”
यह दृश्य किसी इंसान की अंतिम विदाई से अलग नहीं था।
सरपंच का बयान — “डॉग-सा गांव की आत्मा था”
राजियावास ग्राम पंचायत के सरपंच बृजपाल सिंह रावत कहते हैं —
“डॉग-सा सिर्फ कुत्ता नहीं था। वह गांव की आत्मा बन गया था। हर दुख में साथ खड़ा रहता था। हमने सोचा, जब वह हमें अंतिम यात्रा में छोड़ने जाता था, तो आज उसे अकेला कैसे छोड़ दें?”
गांव की महिलाओं की आंखों में आंसू, बच्चों के दिल में खालीपन
डॉग-सा बच्चों का सबसे प्रिय दोस्त था। स्कूल से लौटते वक्त बच्चे उसे बिस्कुट खिलाते, उसके साथ खेलते और वह पूंछ हिलाकर उनका स्वागत करता।
एक बच्चे ने कहा —
“अब स्कूल से आकर कोई हमारा इंतजार नहीं करेगा…”
महिलाएं कहती हैं —
“वह हमारे घरों के बाहर बैठता था, जैसे कोई पहरेदार हो।”
हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल बनी यह विदाई
डॉग-सा की अंतिम यात्रा में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग साथ-साथ चले।
किसी ने नहीं पूछा —
- यह किस धर्म का था?
- इसकी जात क्या थी?
सबने बस इतना कहा —
“यह हमारा था।”
यह दृश्य आज के समय में सांप्रदायिक सौहार्द की एक अनोखी मिसाल बन गया।
सोशल मीडिया पर वायरल हुई ‘डॉग-सा’ की कहानी
जैसे ही इस अनोखी विदाई की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आए, लोग भावुक हो उठे।
लोगों ने लिखा —
- “इंसानियत अभी जिंदा है…”
- “जानवरों से सीखना चाहिए हमें…”
- “डॉग-सा जैसे दिल सबको मिलें…”
कुछ यूजर्स ने इसे —
“भारत की सबसे भावुक डॉग स्टोरी”
बताया।
मनोवैज्ञानिक नजरिया — जानवर क्यों बन जाते हैं परिवार?
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि—
- जानवर बिना शर्त प्यार देते हैं
- वे न धर्म देखते हैं, न जात
- न ही अमीरी-गरीबी
इसी वजह से इंसान उनसे गहरा भावनात्मक जुड़ाव महसूस करता है।
डॉग-सा इसका जीता-जागता उदाहरण था।
क्या भारत में जानवरों का इस तरह अंतिम संस्कार आम है?
हालांकि, भारत में आमतौर पर पालतू जानवरों का अंतिम संस्कार सीमित स्तर पर किया जाता है, लेकिन—
- पूरे गांव द्वारा सामूहिक अंतिम यात्रा निकालना
- धार्मिक अनुष्ठानों के साथ अंतिम संस्कार करना
- उसे सामाजिक सदस्य जैसा सम्मान देना
यह बहुत ही दुर्लभ घटना है।
पहले भी सामने आ चुकी हैं ऐसी कहानियां, लेकिन यह सबसे खास क्यों?
देश में पहले भी कुत्तों के प्रति प्रेम की कई कहानियां सामने आई हैं —
| स्थान | घटना |
|---|---|
| केरल | मालिक की मौत के बाद कुत्ते ने खाना छोड़ दिया |
| उत्तर प्रदेश | ट्रेन हादसे में मालिक की मौत के बाद कुत्ता महीनों स्टेशन पर बैठा रहा |
| महाराष्ट्र | कुत्ते के लिए स्मारक बनाया गया |
लेकिन पूरे गांव द्वारा धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ अंतिम संस्कार शायद पहली बार देखने को मिला।
डॉग-सा — सिर्फ कुत्ता नहीं, एक भावना
डॉग-सा की कहानी हमें यह सिखाती है कि—
“संबंध खून से नहीं, संवेदनाओं से बनते हैं।”
वह न किसी का पालतू था, न किसी का रिश्तेदार — फिर भी सबका अपना था।
क्या यह घटना समाज के लिए कोई संदेश देती है?
बिल्कुल।
यह घटना बताती है कि—
- इंसान और जानवर के बीच रिश्ता कितना गहरा हो सकता है
- समाज में करुणा और संवेदना अभी भी जिंदा है
- धर्म और जाति से ऊपर इंसानियत होती है
निष्कर्ष — जब एक गांव ने अपने सबसे वफादार साथी को विदा किया
राजियावास गांव ने साबित कर दिया कि सम्मान सिर्फ इंसानों का अधिकार नहीं, बल्कि हर उस जीव का है जिसने बिना शर्त प्यार दिया हो।
डॉग-सा की अंतिम यात्रा केवल एक कुत्ते की विदाई नहीं थी —
यह इंसानियत, करुणा और साझा भावनाओं की जीत थी।
आज डॉग-सा भले ही गांव की गलियों में दिखाई न दे, लेकिन उसकी यादें हर दरवाजे, हर आंगन और हर दिल में जिंदा रहेंगी।