Rajasthan News : राजस्थान की प्रसिद्ध कथावाचक और संत समाज में गहरी पहचान रखने वाली साध्वी प्रेम बाईसा की संदिग्ध मौत का मामला छह दिन बीत जाने के बावजूद अब भी पूरी तरह अनसुलझा बना हुआ है। 28 जनवरी को सामने आए इस घटनाक्रम ने न सिर्फ राजस्थान बल्कि पूरे देश के धार्मिक और सामाजिक हलकों में हलचल मचा दी है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण स्पष्ट न होना, विसरा रिपोर्ट का इंतजार, घटनास्थल से जुड़े साक्ष्यों पर उठते सवाल और परिवार व संत समाज के भीतर उभरते मतभेदों ने इस केस को और रहस्यमय बना दिया है।
- Rajasthan : कौन थीं साध्वी प्रेम बाईसा?
- मौत की टाइमलाइन: 28 जनवरी से अब तक क्या-क्या हुआ?
- 28 जनवरी: अचानक बिगड़ी तबीयत
- उसी दिन: आश्रम में हलचल
- पोस्टमार्टम में देरी
- पुलिस जांच की शुरुआत
- पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई, लेकिन जवाब नहीं मिला
- छह दिन बाद भी नहीं सुलझा मामला
- पोस्टमार्टम रिपोर्ट क्यों नहीं दे पाई जवाब?
- पिता बीरमनाथ की भूमिका पर क्यों उठ रहे सवाल?
- मेडिकल एंगल: इंजेक्शन, सांस की तकलीफ और मौत
- पुलिस जांच पर क्यों उठ रहे सवाल?
- मोबाइल फोन और डिजिटल सबूतों की भूमिका
- विसरा रिपोर्ट से क्या उम्मीदें हैं?
- समाधि स्थल पर उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब
- संत समाज में क्यों बढ़ रहे हैं मतभेद?
- प्रशासन और सरकार पर भी बढ़ा दबाव
- सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा मामला
- क्या यह सामान्य मौत हो सकती है?
- केस में अब तक क्या-क्या स्पष्ट है?
- क्या-क्या अब भी रहस्य बना हुआ है?
- क्या यह मामला राजस्थान की धार्मिक संस्थाओं के लिए चेतावनी है?
- आगे क्या?
- विशेषज्ञों की राय
- जनता और श्रद्धालुओं की मांग
- निष्कर्ष
इस मामले में सबसे अधिक चर्चा साध्वी प्रेम बाईसा के पिता बीरमनाथ, आश्रम प्रशासन और पुलिस जांच की कार्यप्रणाली को लेकर हो रही है। जहां एक ओर कुछ संत और अनुयायी पिता का बचाव कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कई संत और सामाजिक कार्यकर्ता पूरे मामले में लापरवाही और संभावित साजिश की आशंका जता रहे हैं।
राजस्थान के बालोतरा जिले के परेउ गांव स्थित समाधि स्थल पर लगातार श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। हर कोई एक ही सवाल पूछ रहा है —
“आखिर साध्वी प्रेम बाईसा की मौत कैसे हुई?”
“क्या यह प्राकृतिक मौत थी या इसके पीछे कोई साजिश छिपी है?”
यह मामला अब सिर्फ एक साध्वी की मौत तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह राजस्थान में धार्मिक संस्थानों की पारदर्शिता, पुलिस जांच प्रणाली की गति और निष्पक्षता, तथा संत समाज की आंतरिक राजनीति जैसे बड़े सवालों को भी सामने ला रहा है।
जोधपुर | राजस्थान न्यूज़/ Sadhvi Prem Baisa death case
Rajasthan : कौन थीं साध्वी प्रेम बाईसा?
साध्वी प्रेम बाईसा राजस्थान के संत समाज में एक जानी-मानी कथावाचक और आध्यात्मिक प्रवक्ता थीं। वे लंबे समय से धार्मिक आयोजनों, प्रवचन सभाओं और कथा वाचन के माध्यम से समाज में सक्रिय थीं। उनकी बड़ी संख्या में महिला अनुयायी थीं, जो उन्हें प्रेरणास्रोत मानती थीं। राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में उनके सत्संग कार्यक्रम आयोजित होते रहे हैं।
उनकी छवि एक सरल, संयमी और अनुशासित संत के रूप में रही है। यही कारण है कि उनकी अचानक और रहस्यमयी मौत ने आम लोगों को भी गहरे सदमे में डाल दिया।
मौत की टाइमलाइन: 28 जनवरी से अब तक क्या-क्या हुआ?
28 जनवरी: अचानक बिगड़ी तबीयत
परिजनों के अनुसार, 28 जनवरी की सुबह साध्वी प्रेम बाईसा की तबीयत अचानक बिगड़ गई थी। बताया गया कि उन्हें किसी कारणवश इंजेक्शन दिया गया, जिसके बाद उनकी स्थिति और खराब हो गई। कुछ ही देर में सांस लेने में तकलीफ बढ़ी और फिर उनकी मृत्यु हो गई।
उसी दिन: आश्रम में हलचल
मौत की खबर फैलते ही आश्रम परिसर में हड़कंप मच गया। बड़ी संख्या में संत, अनुयायी और स्थानीय लोग मौके पर पहुंच गए। शुरुआती तौर पर इसे सामान्य मृत्यु बताया गया, लेकिन जल्द ही हालात बदल गए।
पोस्टमार्टम में देरी
परिवार और संत समाज के कुछ लोगों की मांग पर शव का तत्काल पोस्टमार्टम नहीं कराया गया। इसे लेकर विवाद शुरू हो गया। कुछ संतों ने आरोप लगाया कि पोस्टमार्टम में जानबूझकर देरी की गई, जिससे साक्ष्य प्रभावित हो सकते हैं।
पुलिस जांच की शुरुआत
स्थानीय पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की। आश्रम परिसर को सील किया गया और एफएसएल टीम को मौके पर बुलाया गया।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई, लेकिन जवाब नहीं मिला
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में “कॉज ऑफ डेथ” यानी मृत्यु का स्पष्ट कारण नहीं बताया गया। इसके बाद विसरा जांच के लिए भेजा गया, जिसकी रिपोर्ट अब तक लंबित है।
छह दिन बाद भी नहीं सुलझा मामला
छह दिन बीत जाने के बावजूद पुलिस किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाई है। किसी को न तो क्लीन चिट मिली है और न ही किसी पर औपचारिक आरोप तय किए गए हैं।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट क्यों नहीं दे पाई जवाब?
मेडिकल सूत्रों के अनुसार, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में केवल बाहरी लक्षणों और सामान्य आंतरिक जांच का विवरण है, लेकिन मौत का सटीक कारण निर्धारित नहीं किया जा सका। इसी वजह से विसरा सैंपल एफएसएल (फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी) भेजा गया है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि शरीर में किसी प्रकार का जहर, केमिकल या विषैला पदार्थ मौजूद था या नहीं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि विसरा रिपोर्ट भी सामान्य आती है, तो यह मामला और जटिल हो सकता है, क्योंकि तब मृत्यु का कारण केवल मेडिकल कंडीशन या किसी दुर्लभ प्रतिक्रिया तक सीमित रह सकता है — लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
पिता बीरमनाथ की भूमिका पर क्यों उठ रहे सवाल?
साध्वी प्रेम बाईसा के पिता बीरमनाथ इस पूरे मामले के केंद्र में बने हुए हैं। कुछ संतों और सामाजिक संगठनों ने उन पर आरोप लगाए हैं कि उन्होंने पोस्टमार्टम कराने में देरी की, जिससे जांच प्रभावित हो सकती है। वहीं, बीरमनाथ ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए खुद को निर्दोष बताया है।
बीरमनाथ का पक्ष
बीरमनाथ ने मीडिया और संत समाज के सामने स्पष्ट किया कि:
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आश्रम पूरी तरह से 28 जनवरी की रात से पुलिस की कस्टडी में है।
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उन्होंने कभी पोस्टमार्टम से इनकार नहीं किया, बल्कि केवल यह चाहा कि शव को पहले आश्रम लाया जाए ताकि संत समाज और अनुयायी अंतिम दर्शन कर सकें।
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दूसरी बार एफएसएल टीम जब आश्रम पहुंची, तब वे वहां मौजूद नहीं थे क्योंकि पुलिस पहले ही परिसर सील कर चुकी थी।
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उन्होंने कभी सीसीटीवी कैमरे हटाने का आदेश नहीं दिया, क्योंकि वहां पहले से कैमरे लगे ही नहीं थे।
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खाने में जहर मिलाए जाने की संभावना उन्होंने खारिज की, क्योंकि वही भोजन सभी ने एक साथ किया था।
उन्होंने यह भी बताया कि इंजेक्शन दिए जाने के बाद साध्वी को उल्टी नहीं हुई थी, लेकिन छींक आने लगी थी और सांस लेने में परेशानी बढ़ गई थी। मौत के बाद उनके नाखून नीले पड़ गए थे, लेकिन शरीर पर अन्य कोई असामान्य निशान नहीं थे।
मेडिकल एंगल: इंजेक्शन, सांस की तकलीफ और मौत
मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर साध्वी प्रेम बाईसा की मौत मेडिकल रूप से कैसे हुई?
परिवार के बयान के अनुसार:
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उन्हें किसी कारणवश इंजेक्शन दिया गया था।
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इसके बाद छींक आने लगी और सांस लेने में तकलीफ बढ़ी।
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कुछ ही समय में हालत बिगड़ गई और उनकी मृत्यु हो गई।
मेडिकल विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ मामलों में गंभीर एलर्जी रिएक्शन (एनाफिलैक्टिक शॉक) या दवा की प्रतिकूल प्रतिक्रिया से अचानक सांस रुकने जैसी स्थिति बन सकती है। हालांकि, इसकी पुष्टि केवल मेडिकल और फॉरेंसिक जांच से ही हो सकती है।
यही कारण है कि विसरा रिपोर्ट को इस केस में बेहद अहम माना जा रहा है।
पुलिस जांच पर क्यों उठ रहे सवाल?
इस पूरे मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं।
प्रमुख सवाल
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अगर आश्रम 28 जनवरी की रात से सील था, तो दूसरी बार एफएसएल टीम के पहुंचने पर घटनास्थल “क्लीन” कैसे मिला?
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क्या शुरुआती जांच में साक्ष्य सुरक्षित नहीं किए गए?
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तीन मोबाइल फोन जब्त किए गए हैं, जिनमें दो आईफोन शामिल हैं, लेकिन उनके पासवर्ड अब तक क्यों नहीं मिले?
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विसरा रिपोर्ट छह दिन बाद भेजी गई — इसमें इतनी देरी क्यों हुई?
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मौत की टाइमिंग को लेकर पिता, कंपाउंडर और अस्पताल के बयानों में विरोधाभास क्यों है?
इन सवालों ने पुलिस जांच की गति और पारदर्शिता पर संदेह खड़ा कर दिया है।
मोबाइल फोन और डिजिटल सबूतों की भूमिका
पुलिस ने जांच के दौरान तीन मोबाइल फोन जब्त किए हैं, जिनमें दो आईफोन शामिल हैं। माना जा रहा है कि इन फोनों में कॉल रिकॉर्ड, मैसेज, व्हाट्सएप चैट और अन्य डिजिटल डेटा हो सकता है, जो मौत के पीछे की परिस्थितियों को समझने में मददगार साबित हो सकता है।
हालांकि, अभी तक इन फोनों के पासवर्ड उपलब्ध नहीं कराए गए हैं, जिससे डिजिटल फॉरेंसिक जांच आगे नहीं बढ़ पाई है। इस वजह से भी जांच में देरी हो रही है।
विसरा रिपोर्ट से क्या उम्मीदें हैं?
विसरा रिपोर्ट से यह साफ हो सकेगा कि:
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शरीर में किसी प्रकार का जहर, केमिकल या विषैला तत्व मौजूद था या नहीं।
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किसी दवा या इंजेक्शन की मात्रा सामान्य से अधिक थी या नहीं।
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किसी बाहरी तत्व के कारण मौत हुई या यह प्राकृतिक कारणों से हुई।
विशेषज्ञों का कहना है कि विसरा रिपोर्ट इस केस की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
समाधि स्थल पर उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब
बालोतरा जिले के परेउ गांव में स्थित साध्वी प्रेम बाईसा की समाधि स्थल पर लगातार श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। लोग समाधि की परिक्रमा कर रहे हैं, पूजा-अर्चना कर रहे हैं और न्याय की मांग कर रहे हैं।
श्रद्धालुओं के बीच एक ही सवाल गूंज रहा है —
“प्रेम बाईसा का कातिल कौन है?”
स्थानीय लोगों का कहना है कि वे किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले जांच रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन वे चाहते हैं कि पुलिस इस मामले में पूरी पारदर्शिता और तेजी दिखाए।
संत समाज में क्यों बढ़ रहे हैं मतभेद?
इस पूरे घटनाक्रम के बाद संत समाज भी दो गुटों में बंटता नजर आ रहा है।
1. एक पक्ष: पिता का समर्थन
कुछ संतों का कहना है कि बीरमनाथ ने पूरी स्थिति में संयम और धैर्य रखा है। उनके अनुसार, उन्होंने हमेशा न्याय सुनिश्चित करने की कोशिश की है और किसी भी स्तर पर जांच में बाधा नहीं डाली।
2. दूसरा पक्ष: पिता की भूमिका पर सवाल
वहीं, कुछ संतों का मानना है कि अगर पोस्टमार्टम तुरंत कराया गया होता, तो आज यह मामला इतना उलझा हुआ नहीं होता। उनका कहना है कि देरी से साक्ष्य प्रभावित हुए हैं, जिससे सच्चाई सामने आने में बाधा आ सकती है।
संतों के बयान
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बाड़मेर के चौहटन मठ के मंहत जगदीशपुरी ने कहा कि यदि पोस्टमार्टम तुरंत कराया जाता, तो विवाद इतना नहीं बढ़ता।
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वहीं गुरु मोटनाथ ने कहा कि बीरमनाथ ने हमेशा न्याय सुनिश्चित करने का प्रयास किया और किसी भी कदम में लापरवाही नहीं की।
इन विरोधाभासी बयानों से संत समाज के भीतर गहराते मतभेद साफ नजर आने लगे हैं।
प्रशासन और सरकार पर भी बढ़ा दबाव
यह मामला अब केवल स्थानीय पुलिस तक सीमित नहीं रह गया है। सोशल मीडिया, धार्मिक संगठनों और सामाजिक मंचों पर लगातार यह मांग उठ रही है कि:
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मामले की निष्पक्ष जांच हो।
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यदि जरूरत पड़े तो विशेष जांच दल (SIT) गठित किया जाए।
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विसरा रिपोर्ट और पोस्टमार्टम निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएं।
राजस्थान सरकार और प्रशासन पर भी दबाव बढ़ रहा है कि वे इस संवेदनशील मामले को गंभीरता से लें और जल्द से जल्द सच्चाई सामने लाएं।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा मामला
साध्वी प्रेम बाईसा की मौत का मामला सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। ट्विटर (X), फेसबुक और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर लोग अलग-अलग थ्योरी पेश कर रहे हैं।
कुछ लोग इसे:
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मेडिकल लापरवाही का मामला बता रहे हैं,
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कुछ इसे साजिश से जोड़ रहे हैं,
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तो कुछ इसे प्राकृतिक मौत मानकर विवाद खत्म करने की बात कह रहे हैं।
हालांकि, बिना किसी आधिकारिक पुष्टि के इन दावों पर विश्वास करना सही नहीं माना जा रहा है।
क्या यह सामान्य मौत हो सकती है?
कुछ मेडिकल विशेषज्ञों और सामाजिक विचारकों का मानना है कि हर संदिग्ध मौत जरूरी नहीं कि अपराध ही हो। कई बार दवा की प्रतिकूल प्रतिक्रिया, एलर्जी शॉक या अचानक हार्ट अरेस्ट जैसी स्थितियां भी मौत का कारण बन सकती हैं।
लेकिन इस केस में:
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पोस्टमार्टम रिपोर्ट का स्पष्ट निष्कर्ष न देना,
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विसरा रिपोर्ट का लंबित होना,
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घटनास्थल से जुड़े सवाल,
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और बयानों में विरोधाभास
इन सभी कारणों से इसे केवल सामान्य मौत मान लेना फिलहाल जल्दबाजी होगी।
केस में अब तक क्या-क्या स्पष्ट है?
- साध्वी प्रेम बाईसा की मौत 28 जनवरी को हुई।
- पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण स्पष्ट नहीं बताया गया।
- विसरा रिपोर्ट एफएसएल भेजी गई है, लेकिन रिपोर्ट अभी नहीं आई है।
- तीन मोबाइल फोन पुलिस ने जब्त किए हैं।
- आश्रम परिसर पुलिस की कस्टडी में है।
- किसी को अब तक क्लीन चिट नहीं दी गई है।
- संत समाज और अनुयायियों में मतभेद उभर आए हैं।
क्या-क्या अब भी रहस्य बना हुआ है?
? मौत का असली कारण क्या था?
? इंजेक्शन क्यों दिया गया और किसने दिया?
? पोस्टमार्टम में देरी क्यों हुई?
? घटनास्थल से साक्ष्य क्यों नहीं मिले?
? मोबाइल फोन के पासवर्ड क्यों नहीं दिए गए?
? विसरा रिपोर्ट में क्या सामने आएगा?
इन सवालों के जवाब ही इस केस की दिशा तय करेंगे।
क्या यह मामला राजस्थान की धार्मिक संस्थाओं के लिए चेतावनी है?
यह मामला केवल एक व्यक्ति की मौत तक सीमित नहीं है। इसने राजस्थान में धार्मिक संस्थाओं, आश्रमों और आध्यात्मिक संगठनों की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि:
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धार्मिक संस्थानों में मेडिकल इमरजेंसी प्रोटोकॉल स्पष्ट होने चाहिए।
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हर आश्रम में सीसीटीवी और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए।
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ऐसी घटनाओं में तुरंत और पारदर्शी जांच जरूरी है ताकि अफवाहें न फैलें।
आगे क्या?
अब पूरे मामले की दिशा मुख्य रूप से तीन बातों पर निर्भर करेगी:
- विसरा रिपोर्ट का निष्कर्ष
- डिजिटल फॉरेंसिक जांच (मोबाइल डेटा)
- पुलिस की अंतिम रिपोर्ट
यदि इन तीनों से कोई स्पष्ट संकेत मिलता है, तो इस रहस्य से पर्दा उठ सकता है। अन्यथा यह मामला और लंबा खिंच सकता है।
विशेषज्ञों की राय
क्राइम और फॉरेंसिक मामलों के जानकारों का कहना है कि:
“जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट अस्पष्ट होती है और घटनास्थल से पुख्ता सबूत नहीं मिलते, तो विसरा रिपोर्ट और डिजिटल सबूत सबसे अहम कड़ी बन जाते हैं। जांच में देरी से संदेह जरूर बढ़ता है, लेकिन इससे निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।”
जनता और श्रद्धालुओं की मांग
श्रद्धालुओं, सामाजिक संगठनों और संत समाज के कई वर्गों की एक ही मांग है:
- “निष्पक्ष, पारदर्शी और तेज़ जांच हो।”
- “दोषी चाहे जो भी हो, उसे कानून के सामने लाया जाए।”
- “सच्चाई सामने आए ताकि साध्वी प्रेम बाईसा को सच्चा न्याय मिल सके।”
निष्कर्ष
राजस्थान की चर्चित साध्वी प्रेम बाईसा की मौत अब केवल एक व्यक्तिगत घटना नहीं रही, बल्कि यह एक सामाजिक, धार्मिक और प्रशासनिक मुद्दा बन चुकी है। छह दिन बीत जाने के बाद भी जब मौत का कारण स्पष्ट नहीं हो पाया है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
पिता बीरमनाथ की भूमिका, पुलिस जांच की गति, पोस्टमार्टम में देरी, घटनास्थल से साक्ष्य न मिलना और विसरा रिपोर्ट का इंतजार — ये सभी पहलू इस केस को और रहस्यमय बना रहे हैं।
अब पूरा राजस्थान और संत समाज एक ही बात की ओर देख रहा है —
सच क्या है?
क्या यह प्राकृतिक मौत थी या इसके पीछे कोई साजिश?
जब तक विसरा रिपोर्ट और जांच एजेंसियों की अंतिम रिपोर्ट सामने नहीं आती, तब तक यह सवाल अनुत्तरित ही रहेगा।