Delhi Cyber Fraud: फोन पर मीठी-मीठी बातें, शेयर बाजार में मोटे मुनाफे का झांसा और 20.72 लाख की ठगी, बैंक डिप्टी मैनेजर समेत 3 गिरफ्तार…!

Kishan Modi
15 Min Read
Delhi Cyber Fraud

Delhi Cyber Fraud: मामले में शेयर बाजार में मोटे मुनाफे का झांसा देकर एक व्यक्ति से 20.72 लाख रुपये की ठगी का मामला सामने आया है। दिल्ली पुलिस ने निजी बैंक के डिप्टी मैनेजर समेत तीन लोगों को गिरफ्तार किया है।

Delhi Cyber Fraud शेयर बाजार में मुनाफे का सपना दिखाकर 20.72 लाख की ठगी

शेयर बाजार में निवेश करके कम समय में बड़ा मुनाफा कमाने का सपना दिखाना साइबर ठगों का एक आम तरीका बनता जा रहा है। दिल्ली में सामने आए एक ऐसे ही मामले में एक व्यक्ति को आकर्षक रिटर्न का भरोसा देकर कथित तौर पर 20.72 लाख रुपये ट्रांसफर करा लिए गए। शुरुआत में बातचीत भरोसे के साथ हुई, निवेश पर बेहतर रिटर्न का भरोसा दिलाया गया और धीरे-धीरे पीड़ित से रकम जमा कराई जाती रही।

मामला तब गंभीर हो गया जब ठगी की रकम के लेनदेन की जांच के दौरान एक निजी बैंक के डिप्टी मैनेजर की भूमिका भी सामने आई। दिल्ली पुलिस के उत्तर-पश्चिम जिले की साइबर पुलिस ने इस मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार आरोपियों में कन्हैया दास, राहुल टेलर और निजी बैंक के डिप्टी मैनेजर आरिफ हुसैन मंसूरी शामिल हैं। पुलिस ने आरोपियों के पास से चार मोबाइल फोन भी बरामद किए हैं।

Delhi Cyber Fraud मामले की प्रमुख जानकारी

विषय जानकारी
मामला शेयर बाजार में निवेश के नाम पर कथित साइबर ठगी
ठगी की रकम 20.72 लाख रुपये
कार्रवाई तीन आरोपी गिरफ्तार
बैंक अधिकारी निजी बैंक का डिप्टी मैनेजर
गिरफ्तार आरोपी कन्हैया दास, राहुल टेलर और आरिफ हुसैन मंसूरी
गिरफ्तारी का स्थान राजस्थान का मावली, उदयपुर क्षेत्र
बरामदगी चार मोबाइल फोन
जांच एजेंसी दिल्ली पुलिस, उत्तर-पश्चिम जिला साइबर पुलिस

कैसे शुरू हुआ ठगी का पूरा खेल?

पुलिस के अनुसार, शिकायतकर्ता को शेयर बाजार में निवेश के जरिए आकर्षक रिटर्न मिलने का भरोसा दिलाया गया। बातचीत और संपर्क के जरिए उसके अंदर निवेश को लेकर विश्वास पैदा किया गया। इसके बाद उसे अलग-अलग बैंक खातों में पैसे जमा करने के लिए कहा गया।

पीड़ित ने आरोपियों के बताए खातों में कुल 20 लाख 72 हजार रुपये जमा कर दिए। जब उसे निवेश के बदले अपेक्षित रकम वापस नहीं मिली और कथित तौर पर मुनाफे का वादा पूरा नहीं हुआ, तब उसे ठगी का एहसास हुआ।

इसके बाद मामले की शिकायत साइबर पुलिस से की गई। पुलिस ने शिकायत के आधार पर जांच शुरू की और पैसों के लेनदेन की कड़ियों को जोड़ने का प्रयास किया।

शिकायत के बाद पुलिस ने कैसे शुरू की जांच?

इस मामले में उत्तर-पश्चिम जिला साइबर पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज की गई थी। उपलब्ध पुलिस जानकारी के अनुसार, एफआईआर 27 फरवरी 2025 को दर्ज की गई थी और इसके बाद मामले की तकनीकी जांच शुरू हुई।

साइबर ठगी के मामलों में केवल आरोपी के मोबाइल नंबर या बैंक खाते की जांच ही पर्याप्त नहीं होती। जांचकर्ता पैसों के ट्रांजैक्शन, लाभार्थी खातों, मोबाइल नंबर, डिजिटल उपकरण और संबंधित स्थानों की जानकारी को आपस में जोड़ते हैं।

इस मामले में भी पुलिस ने कथित ठगी की रकम के मनी ट्रेल, बैंक रिकॉर्ड, तकनीकी साक्ष्यों और लाभार्थी खातों से जुड़े विवरणों की जांच की। इसी प्रक्रिया में कन्हैया दास और राहुल टेलर की कथित भूमिका सामने आई।

राजस्थान के मावली तक कैसे पहुंची पुलिस?

जांच के दौरान पुलिस को कथित लेनदेन से जुड़े लोगों के बारे में जानकारी मिली। तकनीकी निगरानी और फील्ड इंटेलिजेंस के आधार पर जांच राजस्थान के उदयपुर जिले के मावली क्षेत्र तक पहुंची।

पुलिस के अनुसार, कन्हैया दास और राहुल टेलर को राजस्थान के मावली क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया। पूछताछ और जांच के दौरान सामने आए डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने निजी बैंक के डिप्टी मैनेजर आरिफ हुसैन मंसूरी तक पहुंच बनाई।

इसके बाद मंसूरी को भी राजस्थान से गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने आरोपियों के पास से चार मोबाइल फोन बरामद किए हैं, जिनकी जांच मामले से जुड़े डिजिटल साक्ष्यों के लिए की जा रही है।

बैंक डिप्टी मैनेजर की क्या भूमिका बताई गई?

इस मामले का सबसे अहम पहलू निजी बैंक के डिप्टी मैनेजर की कथित भूमिका है।

पुलिस के मुताबिक, आरिफ हुसैन मंसूरी ने कथित तौर पर दो प्रतिशत कमीशन के बदले बैंक खाते की व्यवस्था कराने में मदद की। जांच में यह भी सामने आया कि कन्हैया दास का बैंक खाता कथित तौर पर ठगी की रकम प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल किया गया था।

पुलिस का आरोप है कि राहुल टेलर ने सेल्फ चेक के जरिए कथित तौर पर नकदी निकालने और रकम को दूसरे खातों में ट्रांसफर करने में भूमिका निभाई। इस तरह बैंक खाता, नकदी निकासी और रकम ट्रांसफर की अलग-अलग कड़ियों को जोड़कर कथित मनी ट्रेल तैयार किया गया।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि बैंक अधिकारी की भूमिका और उससे जुड़े सभी आरोप फिलहाल पुलिस जांच के आधार पर हैं। अदालत में आरोप साबित होना अलग कानूनी प्रक्रिया है।

2 प्रतिशत कमीशन का क्या कनेक्शन सामने आया?

पुलिस जांच में कथित तौर पर यह बात सामने आई कि बैंक अधिकारी ने खाते की सुविधा उपलब्ध कराने में मदद के बदले दो प्रतिशत कमीशन लिया।

साइबर अपराधों में ऐसे बैंक खातों का इस्तेमाल कथित तौर पर ठगी की रकम को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने के लिए किया जा सकता है। जांच एजेंसियां आम तौर पर यह पता लगाने की कोशिश करती हैं कि रकम सबसे पहले किस खाते में पहुंची, वहां से कहां ट्रांसफर हुई, किसने नकदी निकाली और आखिरकार रकम किस व्यक्ति या नेटवर्क तक पहुंची।

इस मामले में भी पुलिस ने इसी तरह के लेनदेन की जांच की। रिपोर्टों के अनुसार, संबंधित बैंक खाते को कथित तौर पर दूसरे स्तर के खाते के तौर पर इस्तेमाल किया गया था और मौजूदा मामले से जुड़ी करीब 2 लाख रुपये की रकम उस खाते से होकर गुजरी थी।

चार मोबाइल फोन से क्या मिला?

पुलिस ने गिरफ्तार आरोपियों से चार मोबाइल फोन बरामद किए हैं। साइबर अपराध की जांच में मोबाइल फोन काफी महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य हो सकते हैं।

इन उपकरणों से कॉल डिटेल, संपर्क नंबर, संदेश, डिजिटल बातचीत, बैंकिंग गतिविधियों से जुड़े संकेत और अन्य तकनीकी जानकारी की जांच की जा सकती है। हालांकि, किसी डिजिटल उपकरण से बरामद सामग्री का कानूनी महत्व जांच और आगे की न्यायिक प्रक्रिया में तय होता है।

पुलिस के अनुसार, बरामद मोबाइल फोन के विश्लेषण से डिप्टी मैनेजर आरिफ हुसैन मंसूरी से कथित संपर्क और उसकी भूमिका के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिली।

गिरफ्तार किए गए तीनों आरोपी कौन हैं?

पुलिस के अनुसार, इस मामले में गिरफ्तार आरोपियों की पहचान कन्हैया दास, राहुल टेलर और आरिफ हुसैन मंसूरी के रूप में हुई है।

कन्हैया दास पर कथित तौर पर अपना बैंक खाता ठगी की रकम प्राप्त करने के लिए उपलब्ध कराने का आरोप है। राहुल टेलर पर रकम की निकासी और ट्रांसफर में भूमिका होने का आरोप लगाया गया है। वहीं आरिफ हुसैन मंसूरी निजी बैंक में डिप्टी मैनेजर के पद पर कार्यरत था और पुलिस के अनुसार उसने दो प्रतिशत कमीशन के बदले बैंकिंग व्यवस्था में मदद की।

पुलिस के मुताबिक, राहुल टेलर का एक अन्य साइबर धोखाधड़ी मामले में पूर्व रिकॉर्ड भी सामने आया है, जिसकी जानकारी और अन्य संभावित आरोपियों की भूमिका की जांच जारी है।

पीड़ित को कैसे हुआ ठगी का एहसास?

इस तरह की निवेश आधारित साइबर ठगी में शुरुआत अक्सर भरोसा पैदा करने से होती है। पीड़ित को निवेश का मौका, संभावित रिटर्न और आगे लाभ की उम्मीद दिखाई जाती है। कई मामलों में जब व्यक्ति पहली बार पैसा लगाता है तो उसके सामने मुनाफे का आंकड़ा दिखाया जा सकता है या आगे और रकम लगाने के लिए प्रेरित किया जाता है।

इस मामले में भी पुलिस के अनुसार, पीड़ित ने आकर्षक रिटर्न के भरोसे रकम ट्रांसफर की। कुल 20.72 लाख रुपये जमा करने के बाद जब उसे अपेक्षित पैसा वापस नहीं मिला, तब उसे कथित धोखाधड़ी का पता चला।

यही वह चरण होता है जहां साइबर ठगी का शिकार व्यक्ति अक्सर समझ पाता है कि जिस निवेश अवसर को वह वास्तविक समझ रहा था, वह कथित तौर पर धोखाधड़ी का हिस्सा था।

शेयर बाजार के नाम पर होने वाली ठगी से कैसे बचें?

शेयर बाजार में निवेश अपने आप में ठगी नहीं है, लेकिन निवेश के नाम पर गारंटीड या असामान्य रूप से अधिक रिटर्न का दावा करने वाले अनजान लोगों से सावधान रहना जरूरी है।

किसी व्यक्ति को फोन, मैसेज, सोशल मीडिया या किसी ऑनलाइन ग्रुप के जरिए निवेश का प्रस्ताव मिलता है तो केवल उसके बताए स्क्रीनशॉट, मुनाफे के आंकड़े या दूसरे लोगों के कथित अनुभव के आधार पर पैसा ट्रांसफर नहीं करना चाहिए।

निवेश से पहले यह देखना जरूरी है कि सामने वाला व्यक्ति या संस्था वास्तव में अधिकृत है या नहीं। खास तौर पर किसी निजी व्यक्ति के बैंक खाते में निवेश के नाम पर रकम भेजने से पहले पर्याप्त सत्यापन करना चाहिए।

साइबर ठगी हो जाए तो तुरंत क्या करें?

साइबर ठगी में समय बहुत महत्वपूर्ण होता है। अगर किसी व्यक्ति से ऑनलाइन धोखाधड़ी हो जाती है या उसके खाते से बिना अनुमति पैसे निकल जाते हैं, तो उसे तुरंत संबंधित बैंक को जानकारी देनी चाहिए और साइबर अपराध की शिकायत दर्ज करनी चाहिए।

भारत में साइबर वित्तीय धोखाधड़ी की स्थिति में राष्ट्रीय साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 पर तत्काल संपर्क किया जा सकता है। ऑनलाइन शिकायत के लिए राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल का इस्तेमाल भी किया जा सकता है।

जितनी जल्दी शिकायत की जाती है, जांच एजेंसियों के पास संदिग्ध बैंक खातों और लेनदेन पर कार्रवाई करने की संभावना उतनी बेहतर हो सकती है।

दिल्ली साइबर ठगी मामले में अब आगे क्या होगा?

तीनों आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस कथित मनी ट्रेल और अन्य संभावित कड़ियों की जांच कर रही है। यह पता लगाने की कोशिश की जा सकती है कि ठगी की रकम कहां-कहां ट्रांसफर हुई, इस नेटवर्क में और कौन लोग जुड़े थे और अलग-अलग बैंक खातों का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया गया।

पुलिस यह भी जांच कर रही है कि इस मामले में शामिल लोगों की भूमिका केवल इस एक शिकायत तक सीमित थी या किसी बड़े नेटवर्क से भी उनका संबंध था।

फिलहाल पुलिस की जांच और कानूनी प्रक्रिया जारी है। आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों का अंतिम निर्धारण अदालत की प्रक्रिया के बाद ही होगा।

इस मामले से क्या सीख मिलती है?

यह मामला बताता है कि शेयर बाजार में जल्दी और निश्चित मुनाफे का लालच किसी भी व्यक्ति को आर्थिक जोखिम में डाल सकता है। खासकर जब कोई अनजान व्यक्ति लगातार फोन करके निवेश के लिए दबाव बनाए या अलग-अलग खातों में पैसा भेजने को कहे, तो अतिरिक्त सावधानी जरूरी है।

बैंक खातों और बैंकिंग सुविधाओं का कथित तौर पर साइबर अपराध में इस्तेमाल होना भी जांच एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण पहलू है। इस मामले में पुलिस की जांच कथित ठगी की रकम से शुरू होकर बैंक खाते, निकासी, तकनीकी साक्ष्य और बैंक अधिकारी तक पहुंची।

हालांकि, इस पूरे मामले में अंतिम निष्कर्ष पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।

Delhi Cyber Fraud मामले का सार

बिंदु विवरण
ठगी का तरीका शेयर बाजार में निवेश और आकर्षक रिटर्न का कथित झांसा
नुकसान 20.72 लाख रुपये
पुलिस कार्रवाई तीन गिरफ्तार
बैंक अधिकारी की भूमिका पुलिस के अनुसार खाते की व्यवस्था में कथित मदद
कथित कमीशन 2 प्रतिशत
बरामदगी चार मोबाइल फोन
जांच मनी ट्रेल और डिजिटल साक्ष्यों की जांच जारी

निष्कर्ष

दिल्ली के इस साइबर ठगी मामले में शेयर बाजार में निवेश के जरिए मोटा मुनाफा कमाने का लालच एक व्यक्ति को 20.72 लाख रुपये के कथित नुकसान तक ले गया। मामले की जांच के दौरान पुलिस ने न केवल उन लोगों तक पहुंच बनाई जिनके खातों में कथित तौर पर रकम पहुंची, बल्कि एक निजी बैंक के डिप्टी मैनेजर को भी गिरफ्तार किया।

पुलिस के अनुसार, बैंक अधिकारी ने दो प्रतिशत कमीशन के बदले बैंक खाते की व्यवस्था में मदद की थी। जांच में कथित मनी ट्रेल, बैंक रिकॉर्ड और मोबाइल फोन से मिले डिजिटल साक्ष्यों की अहम भूमिका रही।

हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि गिरफ्तार किए गए लोगों के खिलाफ लगाए गए आरोप अभी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन हैं। मामले में आगे की जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कथित साइबर नेटवर्क कितना बड़ा था और इसमें अन्य लोगों की क्या भूमिका रही।

Share This Article
Leave a Comment