Rajasthan Green Movement : राजस्थान की धरती पर सदियों से जीवन और पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने वाला खेजड़ी वृक्ष आज अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है. बीकानेर में चल रहा “खेजड़ी बचाओ आंदोलन” अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है. महापड़ाव का दूसरा दिन है और स्वामी सच्चिदानंद के नेतृत्व में 363 संत, साधु, पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता खुले मैदान में डटे हुए हैं. आंदोलनकारियों ने साफ शब्दों में कहा है कि जब तक सरकार खेजड़ी संरक्षण को लेकर लिखित आश्वासन नहीं देती, तब तक न आंदोलन रुकेगा और न ही आमरण अनशन समाप्त होगा.
- महापड़ाव का दूसरा दिन: संत समाज अडिग, प्रशासन सतर्क
- Rajasthan Green Movement : क्यों खेजड़ी बनी आंदोलन का केंद्र?
- आंदोलन की शुरुआत: चुपचाप कटते पेड़ों से उभरा जन आक्रोश
- आंदोलनकारियों की मुख्य मांगें क्या हैं?
- मौखिक आश्वासन क्यों ठुकरा रहे हैं संत?
- आमरण अनशन की चेतावनी से प्रशासन में बढ़ी चिंता
- सोलर कंपनियों पर गंभीर आरोप
- खेजड़ी और राजस्थान का पारंपरिक रिश्ता
- पर्यावरण विशेषज्ञों की राय: खेजड़ी कटाई से मरुस्थल का संकट गहराएगा
- प्रशासन का पक्ष: संवाद जारी, समाधान की कोशिश
- राजनीति भी हुई सक्रिय, विपक्ष ने सरकार पर साधा निशाना
- आम जनता का समर्थन: गांव-गांव से जुट रहे लोग
- आंदोलन की रणनीति: शांतिपूर्ण लेकिन निर्णायक
- खेजड़ी संरक्षण पर कानून क्यों जरूरी?
- खेजड़ी कटाई और विकास परियोजनाओं का द्वंद्व
- खेजड़ी और जल संकट का संबंध
- खेजड़ी और पशुपालन: ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़
- आंदोलन का सामाजिक और सांस्कृतिक आयाम
- क्या होगा आगे? संभावित परिदृश्य
- प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती
- निष्कर्ष: खेजड़ी बचाने की लड़ाई, भविष्य बचाने की लड़ाई
यह आंदोलन केवल पेड़ों को बचाने की मांग नहीं है, बल्कि यह राजस्थान की पारिस्थितिकी, ग्रामीण जीवन, पशुपालन, जल संरक्षण और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा हुआ सवाल बन चुका है. संत समाज का कहना है कि मौखिक वादों के भरोसे खेजड़ी जैसे जीवनदायी वृक्ष को नहीं छोड़ा जा सकता. अब सरकार को ठोस और लिखित रूप में निर्णय लेने होंगे.
महापड़ाव का दूसरा दिन: संत समाज अडिग, प्रशासन सतर्क
बीकानेर में जिस स्थान पर महापड़ाव लगाया गया है, वहां सुबह से ही वातावरण गंभीर और भावुक बना हुआ है. संतों ने भगवा वस्त्र धारण कर मंत्रोच्चार और मौन साधना के साथ आंदोलन की शुरुआत की थी, लेकिन अब आंदोलन पूरी तरह मांग आधारित और निर्णायक हो चुका है. स्वामी सच्चिदानंद ने मंच से स्पष्ट कहा —
“अब शब्दों से काम नहीं चलेगा. जब तक सरकार खेजड़ी संरक्षण पर लिखित आश्वासन नहीं देती, तब तक यह आंदोलन रुकेगा नहीं. जरूरत पड़ी तो संत समाज प्राण त्यागने को भी तैयार है, लेकिन खेजड़ी का विनाश स्वीकार नहीं करेगा.”
महापड़ाव स्थल पर प्रशासन की ओर से पुलिस बल, स्वास्थ्य विभाग की टीम और जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी तैनात किए गए हैं. संभावित आमरण अनशन और संतों की तबीयत बिगड़ने की आशंका को देखते हुए मेडिकल कैंप लगाए गए हैं, लेकिन आंदोलनकारी किसी भी प्रकार की चिकित्सा सुविधा लेने से इनकार कर रहे हैं, जब तक सरकार लिखित भरोसा नहीं देती.
Rajasthan Green Movement : क्यों खेजड़ी बनी आंदोलन का केंद्र?
राजस्थान में खेजड़ी केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि जीवन प्रणाली का हिस्सा है. इसे मरुस्थल की “कल्पवृक्ष” कहा जाता है. यह वृक्ष गर्मी में पशुओं को चारा देता है, किसानों को आजीविका देता है, मिट्टी को उपजाऊ बनाता है और जल संरक्षण में अहम भूमिका निभाता है. यही कारण है कि राजस्थान के कई हिस्सों में खेजड़ी को धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी प्राप्त है.
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, खेजड़ी का वैज्ञानिक नाम Prosopis cineraria है. यह वृक्ष कठोर से कठोर परिस्थितियों में भी जीवित रह सकता है और आसपास की भूमि की उर्वरता बढ़ाता है. इसके पत्ते, फल और छाल पारंपरिक चिकित्सा और पशुपालन में उपयोग किए जाते हैं. रेगिस्तानी इलाकों में यह वृक्ष तापमान संतुलन और जैव विविधता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है.
आंदोलन की शुरुआत: चुपचाप कटते पेड़ों से उभरा जन आक्रोश
खेजड़ी बचाओ आंदोलन अचानक नहीं उभरा. बीते कुछ वर्षों में राजस्थान के कई जिलों — खासकर बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर और नागौर क्षेत्रों में — औद्योगिक परियोजनाओं, सोलर पार्क्स, सड़क निर्माण और आवासीय विस्तार के नाम पर बड़ी संख्या में खेजड़ी के पेड़ काटे गए.
स्थानीय ग्रामीणों और संत समाज का आरोप है कि कई मामलों में न तो पर्यावरण स्वीकृति ली गई और न ही वैकल्पिक वृक्षारोपण किया गया. धीरे-धीरे यह असंतोष आंदोलन में बदल गया.
स्वामी सच्चिदानंद और उनके अनुयायियों ने पहले प्रशासन को ज्ञापन दिए, धरना प्रदर्शन किए और संवाद की कोशिश की, लेकिन जब कहीं भी ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तब बीकानेर में महापड़ाव का फैसला लिया गया.
आंदोलनकारियों की मुख्य मांगें क्या हैं?
खेजड़ी बचाओ आंदोलन से जुड़े संतों और पर्यावरण प्रेमियों ने सरकार के सामने कुछ स्पष्ट और गैर-समझौतावादी मांगें रखी हैं:
- खेजड़ी वृक्ष को प्रतिबंधित श्रेणी में शामिल किया जाए
यानी बिना सरकारी अनुमति खेजड़ी काटना पूरी तरह गैरकानूनी घोषित किया जाए. - प्रदेशभर में खेजड़ी कटाई पर तत्काल पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए
जब तक नया कानून नहीं बनता, तब तक अस्थायी प्रतिबंध लागू किया जाए. - खेजड़ी संरक्षण को लेकर नया सख्त कानून बनाया जाए
जिसमें अवैध कटाई पर कठोर दंड, भारी जुर्माना और जेल की सजा का प्रावधान हो. - सोलर कंपनियों और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए अलग दिशा-निर्देश बनाए जाएं
यदि कोई परियोजना खेजड़ी को नुकसान पहुंचाती है, तो उसका MOU रद्द किया जाए. - कटे हुए खेजड़ी वृक्षों की भरपाई सुनिश्चित की जाए
हर काटे गए वृक्ष के बदले कम से कम दस नए खेजड़ी पौधे लगाए जाएं. - खेजड़ी संरक्षण की निगरानी के लिए विशेष प्राधिकरण बनाया जाए
जिसमें वन विभाग, पर्यावरण विशेषज्ञ और स्थानीय प्रतिनिधि शामिल हों.
मौखिक आश्वासन क्यों ठुकरा रहे हैं संत?
प्रशासनिक अधिकारियों ने आंदोलनकारियों को मौखिक रूप से आश्वासन दिया है कि सरकार उनकी मांगों पर विचार कर रही है और जल्द सकारात्मक निर्णय लिया जाएगा. लेकिन संत समाज का कहना है कि पहले भी ऐसे कई आश्वासन मिले, लेकिन जमीन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई.
स्वामी सच्चिदानंद ने कहा —
“हमने कई बार मौखिक भरोसे पर आंदोलन स्थगित किए, लेकिन परिणाम वही रहे — खेजड़ी कटती रही. अब भरोसे का युग समाप्त हो चुका है. हमें लिखित गारंटी चाहिए, तारीख चाहिए और कानून चाहिए.”
संत समाज का मानना है कि केवल लिखित आश्वासन ही भविष्य में जवाबदेही तय कर सकता है. यदि सरकार लिखित में प्रतिबद्ध होगी, तो बाद में कोई भी अधिकारी या विभाग जिम्मेदारी से बच नहीं सकेगा.
आमरण अनशन की चेतावनी से प्रशासन में बढ़ी चिंता
महापड़ाव स्थल पर मौजूद 363 संतों ने एकमत से यह निर्णय लिया है कि यदि सरकार ने जल्द लिखित आश्वासन नहीं दिया, तो सभी संत एक साथ आमरण अनशन पर बैठ जाएंगे. यह प्रशासन के लिए गंभीर स्थिति बन सकती है.
स्वास्थ्य विभाग की टीम ने प्राथमिक जांच में बताया है कि कई संत बुजुर्ग हैं और लंबे समय तक भूख हड़ताल उनकी जान के लिए खतरा बन सकती है. बावजूद इसके संत समाज अपने निर्णय पर अडिग है.
प्रशासनिक अधिकारियों ने संतों से बार-बार अपील की है कि वे आमरण अनशन का फैसला वापस लें और संवाद का रास्ता अपनाएं, लेकिन आंदोलनकारियों का कहना है कि संवाद तभी संभव है जब सरकार लिखित में प्रतिबद्धता दिखाए.
सोलर कंपनियों पर गंभीर आरोप
खेजड़ी बचाओ आंदोलन में सोलर कंपनियों को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं. संत समाज का कहना है कि नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर खेजड़ी के पेड़ों को काटा जा रहा है, जबकि वैकल्पिक समाधान मौजूद हैं.
आंदोलनकारियों का आरोप है कि कई मामलों में सोलर पार्क्स के लिए ऐसी जमीन चुनी जाती है जहां घने खेजड़ी वृक्ष मौजूद होते हैं, जबकि खाली बंजर भूमि का विकल्प नजरअंदाज कर दिया जाता है. इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान होता है, बल्कि स्थानीय समुदायों की आजीविका भी प्रभावित होती है.
संत समाज की मांग है कि यदि कोई सोलर कंपनी खेजड़ी संरक्षण नियमों का उल्लंघन करती है, तो उसका MOU तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाए और कंपनी पर भारी जुर्माना लगाया जाए.
खेजड़ी और राजस्थान का पारंपरिक रिश्ता
राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में खेजड़ी को केवल वृक्ष नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य की तरह माना जाता है. कई गांवों में खेजड़ी के नीचे पंचायतें होती हैं, सामाजिक निर्णय लिए जाते हैं और धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होते हैं.
राजस्थानी लोक संस्कृति में खेजड़ी के महत्व को दर्शाने वाली कई कहावतें, लोकगीत और कथाएं प्रचलित हैं. इतिहासकारों के अनुसार, 18वीं सदी में जोधपुर के खेजड़ली गांव में खेजड़ी वृक्षों को बचाने के लिए 363 लोगों ने अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे. उसी बलिदान की स्मृति में आज भी राजस्थान में खेजड़ी संरक्षण को धार्मिक कर्तव्य माना जाता है.
स्वामी सच्चिदानंद ने अपने संबोधन में कहा —
“हमारे पूर्वजों ने खेजड़ी के लिए बलिदान दिया था. आज वही इतिहास हमें पुकार रहा है. यदि हम खेजड़ी को नहीं बचा सके, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी.”
पर्यावरण विशेषज्ञों की राय: खेजड़ी कटाई से मरुस्थल का संकट गहराएगा
पर्यावरण वैज्ञानिकों का कहना है कि खेजड़ी जैसे वृक्षों की अंधाधुंध कटाई से राजस्थान का रेगिस्तानी पर्यावरण गंभीर संकट में पड़ सकता है. खेजड़ी न केवल मिट्टी के कटाव को रोकती है, बल्कि नाइट्रोजन फिक्सेशन के जरिए भूमि की उर्वरता भी बढ़ाती है.
विशेषज्ञों के अनुसार:
- खेजड़ी के नीचे उगने वाली फसलें अधिक उत्पादक होती हैं.
- यह वृक्ष गर्मी में छाया प्रदान करता है, जिससे पशुओं और मनुष्यों को राहत मिलती है.
- खेजड़ी जल संरक्षण में मदद करती है और भूजल स्तर को संतुलित बनाए रखने में सहायक होती है.
- यह जैव विविधता को बढ़ावा देती है और कई पक्षी व जीवों का प्राकृतिक आवास है.
यदि खेजड़ी का विनाश इसी तरह जारी रहा, तो राजस्थान में मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया और तेज हो सकती है, जिससे कृषि, पशुपालन और ग्रामीण जीवन पर दूरगामी असर पड़ेगा.
प्रशासन का पक्ष: संवाद जारी, समाधान की कोशिश
बीकानेर जिला प्रशासन का कहना है कि सरकार इस मामले को गंभीरता से ले रही है और संत समाज की मांगों पर विचार किया जा रहा है. अधिकारियों के अनुसार, वन विभाग और पर्यावरण विभाग से रिपोर्ट मंगवाई गई है और जल्द उच्चस्तरीय बैठक होने की संभावना है.
एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया —
“सरकार खेजड़ी संरक्षण को लेकर संवेदनशील है. संत समाज की भावनाओं का सम्मान किया जाएगा. बातचीत के जरिए समाधान निकालने का प्रयास किया जा रहा है.”
हालांकि आंदोलनकारी इस बात पर जोर दे रहे हैं कि जब तक लिखित आश्वासन नहीं मिलता, तब तक किसी भी बातचीत का कोई महत्व नहीं है.
राजनीति भी हुई सक्रिय, विपक्ष ने सरकार पर साधा निशाना
खेजड़ी बचाओ आंदोलन ने राजनीतिक गलियारों में भी हलचल पैदा कर दी है. विपक्षी दलों ने सरकार पर पर्यावरण संरक्षण में विफल रहने का आरोप लगाया है और संत समाज की मांगों का समर्थन किया है.
कुछ नेताओं ने महापड़ाव स्थल पर पहुंचकर आंदोलनकारियों से मुलाकात की और कहा कि यदि सरकार जल्द कार्रवाई नहीं करती, तो वे इस मुद्दे को विधानसभा तक ले जाएंगे.
वहीं सत्तारूढ़ दल के नेताओं का कहना है कि सरकार पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है और संत समाज की मांगों को गंभीरता से लिया जा रहा है.
आम जनता का समर्थन: गांव-गांव से जुट रहे लोग
बीकानेर और आसपास के ग्रामीण इलाकों से बड़ी संख्या में लोग महापड़ाव स्थल पर पहुंच रहे हैं. किसान, पशुपालक, महिलाएं और युवा आंदोलनकारियों के समर्थन में शामिल हो रहे हैं.
कई ग्रामीणों का कहना है कि खेजड़ी उनके जीवन का आधार है. एक किसान ने कहा —
“खेजड़ी नहीं होगी तो हमारी जमीन बंजर हो जाएगी, पशुओं को चारा नहीं मिलेगा और गांव उजड़ जाएंगे. यह आंदोलन सिर्फ पेड़ बचाने का नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व का सवाल है.”
समर्थन का यह जनसैलाब आंदोलन को और मजबूत बना रहा है और प्रशासन पर दबाव बढ़ा रहा है.
आंदोलन की रणनीति: शांतिपूर्ण लेकिन निर्णायक
संत समाज ने स्पष्ट किया है कि यह आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण रहेगा, लेकिन किसी भी कीमत पर अपनी मांगों से पीछे नहीं हटेंगे. आंदोलनकारियों ने हिंसा, तोड़फोड़ या अव्यवस्था से दूरी बनाए रखने का संकल्प लिया है.
स्वामी सच्चिदानंद ने कहा —
“हमारी लड़ाई सत्य, अहिंसा और प्रकृति के पक्ष में है. लेकिन यदि सरकार नहीं सुनी, तो हमारा संकल्प और मजबूत होगा.”
महापड़ाव स्थल पर नियमित रूप से भजन, प्रवचन और पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जिससे आंदोलन को आध्यात्मिक और सामाजिक समर्थन मिल रहा है.
खेजड़ी संरक्षण पर कानून क्यों जरूरी?
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान कानूनों में खेजड़ी को लेकर स्पष्ट और सख्त प्रावधान नहीं हैं. कई बार विकास परियोजनाओं को प्राथमिकता देते हुए पर्यावरण नियमों को शिथिल कर दिया जाता है, जिससे खेजड़ी जैसे वृक्षों का संरक्षण कमजोर पड़ जाता है.
नया कानून बनने से:
- खेजड़ी की अवैध कटाई पर प्रभावी रोक लगेगी.
- दोषियों पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई संभव होगी.
- विकास परियोजनाओं में पर्यावरण संतुलन को प्राथमिकता दी जाएगी.
- ग्रामीण समुदायों की आजीविका सुरक्षित रहेगी.
- राजस्थान की पारिस्थितिकी को दीर्घकालिक संरक्षण मिलेगा.
यही कारण है कि संत समाज केवल अस्थायी प्रतिबंध नहीं, बल्कि स्थायी कानूनी संरक्षण की मांग कर रहा है.
खेजड़ी कटाई और विकास परियोजनाओं का द्वंद्व
राजस्थान में बुनियादी ढांचे का विस्तार, सोलर ऊर्जा परियोजनाएं और औद्योगिक विकास तेजी से हो रहा है. सरकार का कहना है कि ये परियोजनाएं रोजगार और आर्थिक प्रगति के लिए जरूरी हैं. लेकिन संत समाज और पर्यावरण विशेषज्ञों का तर्क है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं.
यदि परियोजनाओं की योजना पर्यावरण अनुकूल तरीके से बनाई जाए और खेजड़ी जैसे महत्वपूर्ण वृक्षों को बचाया जाए, तो विकास और संरक्षण दोनों साथ-साथ संभव हैं.
आंदोलनकारियों का कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन ऐसा विकास जो पर्यावरण को नष्ट कर दे, उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता.
खेजड़ी और जल संकट का संबंध
राजस्थान जैसे शुष्क राज्य में जल संरक्षण सबसे बड़ी चुनौती है. विशेषज्ञों के अनुसार, खेजड़ी जैसे वृक्ष मिट्टी की नमी बनाए रखने और भूजल स्तर को स्थिर रखने में मदद करते हैं. इनके कटने से जल संकट और गहरा सकता है.
खेजड़ी की गहरी जड़ें जमीन में पानी को रोकती हैं और वर्षा जल के बहाव को धीमा करती हैं, जिससे मिट्टी का कटाव कम होता है और जलस्रोत सुरक्षित रहते हैं. यही कारण है कि ग्रामीण इलाकों में खेजड़ी के आसपास कुएं और तालाब लंबे समय तक पानी से भरे रहते हैं.
इस दृष्टि से भी खेजड़ी संरक्षण केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि जल सुरक्षा का मुद्दा बन चुका है.
खेजड़ी और पशुपालन: ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़
राजस्थान की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा पशुपालन पर आधारित है. खेजड़ी के पत्ते और फल पशुओं के लिए पौष्टिक चारे का काम करते हैं, खासकर सूखे के समय जब अन्य चारा उपलब्ध नहीं होता.
कई पशुपालकों का कहना है कि खेजड़ी के बिना उनके पशुओं को जीवित रखना मुश्किल हो जाएगा. इससे दूध उत्पादन घटेगा, पशुधन कमजोर होगा और ग्रामीण आय प्रभावित होगी.
इसलिए संत समाज का तर्क है कि खेजड़ी संरक्षण केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है.
आंदोलन का सामाजिक और सांस्कृतिक आयाम
खेजड़ी बचाओ आंदोलन केवल पर्यावरण आंदोलन नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक बन चुका है. संत समाज का मानना है कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना भारतीय परंपरा का मूल सिद्धांत रहा है.
स्वामी सच्चिदानंद ने कहा —
“हमारी संस्कृति में वृक्षों को देवता माना गया है. खेजड़ी केवल लकड़ी नहीं देती, वह जीवन देती है. यदि हम उसे नहीं बचा सके, तो हम अपनी संस्कृति और मूल्यों को खो देंगे.”
महापड़ाव स्थल पर धार्मिक अनुष्ठान, पर्यावरण जागरूकता सत्र और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जिससे आंदोलन को व्यापक सामाजिक समर्थन मिल रहा है.
क्या होगा आगे? संभावित परिदृश्य
फिलहाल स्थिति तनावपूर्ण लेकिन शांतिपूर्ण बनी हुई है. यदि सरकार जल्द लिखित आश्वासन देती है, तो आंदोलन स्थगित हो सकता है और आमरण अनशन टल सकता है. लेकिन यदि ऐसा नहीं हुआ, तो आंदोलन और तेज हो सकता है और इसका विस्तार प्रदेशभर में होने की संभावना है.
संभावित परिदृश्य:
- सरकार लिखित आश्वासन देती है — आंदोलन समाप्त, कानून निर्माण की प्रक्रिया शुरू.
- आंशिक आश्वासन मिलता है — आंदोलन जारी, लेकिन संवाद की संभावना बनी रहती है.
- कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती — आमरण अनशन शुरू, आंदोलन राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच सकता है.
संत समाज ने स्पष्ट किया है कि वे किसी भी कीमत पर खेजड़ी संरक्षण से पीछे नहीं हटेंगे.
प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती
बीकानेर में खेजड़ी बचाओ आंदोलन प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है. एक ओर संत समाज का नैतिक और सामाजिक समर्थन है, तो दूसरी ओर पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन बनाने की जिम्मेदारी सरकार पर है.
यदि आंदोलन लंबा चलता है, तो यह राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है. इसलिए सरकार पर दबाव है कि वह जल्द कोई ठोस और संतोषजनक निर्णय ले.
निष्कर्ष: खेजड़ी बचाने की लड़ाई, भविष्य बचाने की लड़ाई
बीकानेर में चल रहा खेजड़ी बचाओ आंदोलन केवल पेड़ों को बचाने का संघर्ष नहीं है, बल्कि यह राजस्थान के पर्यावरण, संस्कृति, ग्रामीण जीवन और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की रक्षा की लड़ाई बन चुका है.
संत समाज का यह आंदोलन यह संदेश दे रहा है कि विकास तभी सार्थक है जब वह प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चले. यदि खेजड़ी जैसी जीवनदायी विरासत को नहीं बचाया गया, तो उसका नुकसान केवल आज नहीं, बल्कि आने वाली सदियों तक महसूस किया जाएगा.
अब सबकी निगाहें सरकार पर टिकी हैं — क्या वह संत समाज की मांगों को लिखित रूप में स्वीकार करेगी, या यह आंदोलन और व्यापक रूप लेगा? आने वाले दिन तय करेंगे कि राजस्थान अपनी हरियाली और विरासत को बचा पाएगा या नहीं.