Gold and Stock Market Fall Together: शेयर और सोना दोनों एकसाथ क्यों गिर रहे हैं? जानिए निवेशकों के लिए क्या है इसका मतलब

Hemant Singh
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Gold and Stock Market Fall Together : आमतौर पर जब शेयर बाजार गिरता है, तब निवेशकों का रुख सोने जैसे सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर होता है. लेकिन 2026 की शुरुआत में बाजार ने निवेशकों को चौंका दिया है. इस बार शेयर बाजार और सोने के दाम दोनों एकसाथ गिरते नजर आ रहे हैं. यह स्थिति निवेश की पारंपरिक सोच के उलट है और इसी कारण निवेशक इसे लेकर असमंजस में हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि यह गिरावट किसी एक सेक्टर की कमजोरी नहीं, बल्कि पूरी वित्तीय व्यवस्था में नकदी की कमी, वैश्विक अनिश्चितता और निवेशकों की बदलती रणनीति का नतीजा है. इसे बाजार की भाषा में ‘डी-रिस्किंग फेज’ कहा जा रहा है, जिसमें निवेशक जोखिम से दूर भागकर सबसे सुरक्षित विकल्प यानी नकदी को प्राथमिकता देते हैं.

जब मजबूरी बन जाए बिकवाली: मार्जिन कॉल का असर

जब शेयर बाजार में अचानक बड़ी गिरावट आती है, तो कर्ज लेकर निवेश करने वाले निवेशकों पर मार्जिन कॉल का दबाव बनता है. ब्रोकरेज कंपनियां उनसे अतिरिक्त पैसे जमा करने को कहती हैं. अगर निवेशक ऐसा नहीं कर पाते, तो उन्हें अपनी होल्डिंग्स बेचनी पड़ती हैं.

ऐसे में सोना पहली पसंद बनता है क्योंकि इसे आसानी से और तुरंत नकदी में बदला जा सकता है. यही वजह है कि कई बार शेयर बाजार की गिरावट के दौरान सोने में भी बिकवाली देखने को मिलती है. यह कमजोरी सोने की उपयोगिता पर सवाल नहीं उठाती, बल्कि यह मजबूरी में की गई बिक्री का नतीजा होती है.

डॉलर मजबूत, सोना कमजोर — उल्टा रिश्ता

अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतें अमेरिकी डॉलर में तय होती हैं. जब डॉलर मजबूत होता है, तो अन्य देशों के निवेशकों के लिए सोना महंगा पड़ता है, जिससे उसकी मांग घट जाती है. मौजूदा हालात में डॉलर की मजबूती ने सोने पर अतिरिक्त दबाव बनाया है.

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह स्थिति खास तौर पर उभरते बाजारों के निवेशकों के लिए चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि उनके लिए सोना पहले की तुलना में ज्यादा महंगा और कम आकर्षक हो जाता है.

‘कैश इज किंग’ सोच ने बदला निवेश का रुख

बाजार में अनिश्चितता बढ़ने पर निवेशक अक्सर यह मानने लगते हैं कि नकदी ही सबसे सुरक्षित संपत्ति है. इस सोच को ‘कैश इज किंग’ कहा जाता है. ऐसे समय में निवेशक शेयर, बॉन्ड, गोल्ड — हर तरह की एसेट बेचकर सिर्फ कैश में रहना चाहते हैं, ताकि किसी भी अचानक मौके या संकट में वे तुरंत कदम उठा सकें.

यही कारण है कि इस बार सोना भी सुरक्षित विकल्प की भूमिका निभाने में कमजोर दिख रहा है और बिकवाली के दबाव में आ गया है.

ऊंची ब्याज दरें: न शेयर को राहत, न सोने को

केंद्रीय बैंकों की ओर से ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा रखने के संकेत भी बाजार की गिरावट का बड़ा कारण हैं. ऊंची ब्याज दरों के दौर में:

  • शेयर बाजार पर दबाव रहता है क्योंकि कंपनियों की लागत बढ़ जाती है और मुनाफा घटने की आशंका होती है.

  • सोना भी आकर्षक नहीं लगता क्योंकि यह कोई ब्याज या रिटर्न नहीं देता, जबकि बैंक जमा और बॉन्ड बेहतर विकल्प दिखने लगते हैं.

इस दोहरी मार ने शेयर और गोल्ड दोनों को कमजोर किया है.

एल्गोरिदम ट्रेडिंग ने बढ़ाई गिरावट की रफ्तार

आज के दौर में बाजार का बड़ा हिस्सा एल्गोरिदम और हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग सिस्टम द्वारा संचालित होता है. जैसे ही बाजार में गिरावट के संकेत मिलते हैं, ये सिस्टम सेकेंडों में बड़े पैमाने पर बिकवाली के ऑर्डर डाल देते हैं.

इससे गिरावट की गति तेज हो जाती है और कई बार ऐसा लगता है कि सभी एसेट क्लास एकसाथ टूट रही हैं — चाहे वे शेयर हों, बॉन्ड हों या सोना.

क्या सोने की ‘सेफ-हेवन’ छवि खत्म हो रही है?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति अस्थायी है. इतिहास बताता है कि लंबे समय में सोना संकट के दौर में अपनी सेफ-हेवन भूमिका निभाता ही है. हालांकि, शुरुआती झटकों के समय अक्सर नकदी की जरूरत सबसे ज्यादा होती है, जिससे सोना भी बिकवाली के दबाव में आ जाता है.

जब बाजार में स्थिरता लौटती है और निवेशक दोबारा जोखिम लेने के लिए तैयार होते हैं, तब आमतौर पर सोने में फिर से मजबूती देखने को मिलती है.

निवेशकों के लिए क्या संकेत?

इस असामान्य ट्रेंड से निवेशकों के लिए कुछ अहम सबक निकलते हैं:

  1. डाइवर्सिफिकेशन जरूरी है — किसी एक एसेट पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है.

  2. शॉर्ट टर्म उतार-चढ़ाव से घबराएं नहीं — बाजार की चाल अक्सर अस्थायी होती है.

  3. नकदी की भूमिका अहम है — संकट के समय लिक्विडिटी सबसे बड़ी ताकत बन जाती है.

  4. लॉन्ग टर्म दृष्टिकोण रखें — सोना और शेयर दोनों लंबी अवधि में ऐतिहासिक रूप से मजबूत रिटर्न देते रहे हैं.

निष्कर्ष

2026 की शुरुआत में शेयर बाजार और सोने दोनों में एकसाथ गिरावट ने निवेशकों को चौंका जरूर दिया है, लेकिन यह कोई स्थायी बदलाव नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक माहौल, नकदी संकट और निवेशकों की मानसिकता में बदलाव का नतीजा है. विशेषज्ञ मानते हैं कि जैसे-जैसे बाजार में स्थिरता आएगी, वैसे-वैसे यह असामान्य ट्रेंड भी सामान्य पैटर्न में लौट सकता है.

फिलहाल निवेशकों के लिए सबसे जरूरी है कि वे जल्दबाजी में फैसले न लें और संतुलित रणनीति के साथ आगे बढ़ें.

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