Rajasthan High Court News : Jaipur News | merarajasthannews
- कैसे शुरू हुई जेल की सलाखों के पीछे यह प्रेम कहानी?
- ओपन जेल में लिव-इन जैसा रिश्ता, फिर शादी का फैसला
- हाईकोर्ट का हस्तक्षेप, पैरोल की मंजूरी
- कहां और कैसे हुई शादी?
- कौन हैं प्रिया सेठ और हनुमान प्रसाद?
- क्या जेल में शादी करना कानूनी है?
- क्या यह पहली बार हुआ है?
- ओपन जेल क्या होती है? यहां कैदियों को कैसी आजादी मिलती है?
- जेल में प्यार — समाज के लिए सवाल या उम्मीद?
- जेल प्रशासन की प्रतिक्रिया
- आलोचना भी कम नहीं
- कानूनी विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
- मनोवैज्ञानिक नजरिया: क्या प्यार अपराधियों को बदल सकता है?
- क्या पैरोल खत्म होने के बाद दोनों साथ रह पाएंगे?
- क्या उम्रकैद का मतलब पूरी जिंदगी जेल में रहना होता है?
- समाज में पुनर्वास की दिशा में एक कदम?
- मीडिया और सोशल मीडिया पर क्यों छाई यह खबर?
- क्या यह भविष्य में ट्रेंड बनेगा?
- निष्कर्ष: सलाखों के पीछे भी धड़कते हैं दिल
राजस्थान की जेल व्यवस्था से जुड़ी एक ऐसी प्रेम कहानी सामने आई है, जिसने कानून, समाज और मानवीय संवेदनाओं तीनों पर नई बहस छेड़ दी है। दो अलग-अलग जघन्य हत्याकांडों में उम्रकैद की सजा काट रहे प्रिया सेठ और हनुमान प्रसाद उर्फ जैक आज शादी के बंधन में बंध गए हैं — वह भी पैरोल पर बाहर आकर।
जयपुर की सांगानेर ओपन जेल में शुरू हुआ यह रिश्ता राजस्थान हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद विवाह तक पहुंचा। जिला पैरोल एडवाइजरी कमेटी ने दोनों को 15 दिनों की पैरोल दी, जिसके दौरान शादी अलवर जिले के बड़ौदामेव गांव में हनुमान के पैतृक घर पर संपन्न हुई।
यह कहानी सिर्फ एक शादी की नहीं, बल्कि उस बदलाव की है जो जेल सुधार प्रणाली, अपराधियों के पुनर्वास और मानवाधिकारों की सोच में धीरे-धीरे देखने को मिल रहा है।
कैसे शुरू हुई जेल की सलाखों के पीछे यह प्रेम कहानी?
राजस्थान की राजधानी जयपुर स्थित सेंट्रल जेल में सजा काट रहे प्रिया सेठ और हनुमान प्रसाद को करीब एक साल पहले राजस्थान प्रिजनर्स ओपन एयर कैंप नियम, 1972 के तहत सांगानेर ओपन जेल में स्थानांतरित किया गया था।
ओपन जेल का उद्देश्य कैदियों को समाज की मुख्यधारा से दोबारा जोड़ना होता है। यहां उन्हें—
- सीमित स्वतंत्रता
- काम करने की अनुमति
- परिवार से मिलने का अवसर
- सामाजिक गतिविधियों में भागीदारी
जैसी सुविधाएं मिलती हैं।
यहीं दोनों की पहली मुलाकात हुई। धीरे-धीरे बातचीत बढ़ी, भावनात्मक जुड़ाव हुआ और कुछ ही महीनों में दोनों एक-दूसरे के बेहद करीब आ गए।
ओपन जेल में लिव-इन जैसा रिश्ता, फिर शादी का फैसला
सूत्रों के अनुसार, पिछले कई महीनों से प्रिया और हनुमान ओपन जेल परिसर में एक-दूसरे के साथ रह रहे थे, जिसे जेल प्रशासन की अनुमति से लिव-इन रिलेशनशिप जैसा रिश्ता माना जा रहा था।
नवंबर 2025 में दोनों ने शादी करने का फैसला किया और अपने परिवारों को इसकी जानकारी दी। दोनों परिवारों ने इस रिश्ते को स्वीकार करते हुए विवाह की सहमति दे दी।
इसके बाद दिसंबर 2025 में दोनों ने पैरोल के लिए आवेदन किया, ताकि वे बाहर जाकर सामाजिक रीति-रिवाजों के साथ विवाह कर सकें।
हाईकोर्ट का हस्तक्षेप, पैरोल की मंजूरी
शादी की अनुमति के लिए दोनों ने राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 7 जनवरी 2026 को हाईकोर्ट ने जिला पैरोल एडवाइजरी कमेटी को निर्देश दिया कि वह सात दिनों के भीतर इस मामले पर निर्णय करे।
कमेटी ने सभी पहलुओं की जांच के बाद दोनों को 15 दिनों की पैरोल मंजूर कर दी।
अधिवक्ता विश्राम प्रजापति ने दोनों की ओर से पैरवी करते हुए अदालत में यह दलील दी कि—
“शादी व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। यदि कैदी सुधार की दिशा में आगे बढ़ रहा है और जेल नियमों का पालन कर रहा है, तो उसे यह अधिकार मिलना चाहिए।”
कहां और कैसे हुई शादी?
शादी अलवर जिले के बड़ौदामेव गांव में हनुमान के पैतृक घर पर हुई। परिवार के सदस्य, रिश्तेदार और कुछ चुनिंदा लोग ही समारोह में शामिल हुए।
सूत्रों के अनुसार—
- विवाह पारंपरिक रीति-रिवाजों से संपन्न हुआ
- पुलिस और प्रशासन की निगरानी में कार्यक्रम आयोजित किया गया
- दोनों ने पैरोल अवधि पूरी होने के बाद वापस जेल लौटने का लिखित आश्वासन दिया
कौन हैं प्रिया सेठ और हनुमान प्रसाद?
प्रिया सेठ
प्रिया सेठ राजस्थान में हुए एक जघन्य हत्या मामले में दोषी ठहराई गई थीं और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। सजा के दौरान उनका व्यवहार जेल प्रशासन की नजर में संतोषजनक रहा, जिसके चलते उन्हें ओपन जेल में स्थानांतरित किया गया।
हनुमान प्रसाद उर्फ जैक
हनुमान प्रसाद भी एक अलग हत्या मामले में दोषी पाए गए थे। उनका जेल रिकॉर्ड भी अनुशासित और सकारात्मक व्यवहार वाला रहा, जिसके कारण उन्हें ओपन जेल सुविधा दी गई।
दोनों के बीच कोई पारिवारिक या सामाजिक संबंध पहले से नहीं था। उनकी कहानी पूरी तरह जेल में हुई मुलाकात से शुरू हुई।
क्या जेल में शादी करना कानूनी है?
भारत में जेल में बंद कैदियों को विवाह करने से कोई कानून सीधे तौर पर नहीं रोकता। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के कई फैसलों में कहा गया है कि—
“शादी व्यक्ति का मौलिक अधिकार है और जेल में बंद होना इस अधिकार को पूरी तरह खत्म नहीं करता।”
हालांकि—
- कैदियों को बाहर जाकर शादी करने के लिए पैरोल या फर्लो की आवश्यकता होती है
- जेल प्रशासन और जिला प्रशासन की अनुमति जरूरी होती है
- सुरक्षा और कानून व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाती है
इस मामले में भी यही प्रक्रिया अपनाई गई।
क्या यह पहली बार हुआ है?
नहीं। भारत में इससे पहले भी कई मामलों में कैदियों को शादी के लिए पैरोल दी गई है।
कुछ प्रमुख उदाहरण—
| राज्य | वर्ष | मामला |
|---|---|---|
| महाराष्ट्र | 2018 | उम्रकैद कैदी को विवाह हेतु पैरोल |
| तमिलनाडु | 2020 | कैदी दंपती को जेल में विवाह की अनुमति |
| पंजाब | 2022 | हत्या के दोषी को शादी के लिए अस्थायी रिहाई |
हालांकि, दो उम्रकैद दोषियों का आपस में शादी करना और वह भी जेल में पनपे रिश्ते के आधार पर, बेहद दुर्लभ और चर्चा का विषय बना है।
ओपन जेल क्या होती है? यहां कैदियों को कैसी आजादी मिलती है?
राजस्थान सहित कई राज्यों में ओपन जेल प्रणाली लागू है, जिसका उद्देश्य कैदियों को समाज के साथ फिर से जोड़ना होता है।
ओपन जेल की विशेषताएं—
- बिना ऊंची दीवारों और सलाखों के परिसर
- कैदी काम पर जा सकते हैं
- परिवार से मिल सकते हैं
- स्वयं का खाना बना सकते हैं
- सामाजिक व्यवहार सीख सकते हैं
सांगानेर ओपन जेल राजस्थान की सबसे चर्चित ओपन जेलों में से एक है।
जेल में प्यार — समाज के लिए सवाल या उम्मीद?
प्रिया और हनुमान की कहानी ने समाज के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं—
- क्या अपराध करने वाले लोग प्यार और दूसरा मौका पाने के हकदार हैं?
- क्या जेल सिर्फ सजा देने की जगह है या सुधार का माध्यम भी?
- क्या समाज ऐसे रिश्तों को स्वीकार कर पाएगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि—
“यदि कोई व्यक्ति अपराध के बाद सुधार की दिशा में आगे बढ़ रहा है और सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाने के लिए तैयार है, तो उसे दूसरा मौका मिलना चाहिए।”
जेल प्रशासन की प्रतिक्रिया
जेल अधिकारियों के अनुसार—
- दोनों कैदियों का व्यवहार अनुशासित और सकारात्मक रहा है
- ओपन जेल में रहते हुए उन्होंने किसी नियम का उल्लंघन नहीं किया
- शादी की अनुमति सभी कानूनी प्रक्रियाओं के तहत दी गई
एक वरिष्ठ जेल अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा—
“हमारा उद्देश्य सिर्फ सजा देना नहीं, बल्कि कैदियों को बेहतर इंसान बनाकर समाज में लौटने योग्य बनाना है।”
आलोचना भी कम नहीं
हालांकि इस फैसले पर सोशल मीडिया और समाज के कुछ वर्गों में सवाल भी उठ रहे हैं—
- क्या उम्रकैद दोषियों को ऐसी छूट मिलनी चाहिए?
- क्या इससे पीड़ित परिवारों की भावनाएं आहत नहीं होंगी?
- क्या इससे अपराधियों के प्रति समाज का नजरिया नरम पड़ेगा?
कुछ लोगों का कहना है कि—
“अपराध कितना भी बड़ा हो, मानव भावनाओं और सुधार की संभावना को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता।”
कानूनी विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
वरिष्ठ अधिवक्ताओं के मुताबिक—
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है
- इसमें विवाह और परिवार बसाने का अधिकार भी शामिल है
- जेल में बंद व्यक्ति भी पूरी तरह इन अधिकारों से वंचित नहीं होता
यदि जेल नियमों का पालन होता है और सार्वजनिक सुरक्षा को खतरा नहीं है, तो अदालतें ऐसे मामलों में राहत देती हैं।
मनोवैज्ञानिक नजरिया: क्या प्यार अपराधियों को बदल सकता है?
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि—
- भावनात्मक जुड़ाव अपराधियों के पुनर्वास में अहम भूमिका निभा सकता है
- परिवार और रिश्तों का सहारा व्यक्ति को जिम्मेदार बनाता है
- यह दोबारा अपराध करने की संभावना को भी कम कर सकता है
इसी सोच के तहत कई देशों में प्रिजन फैमिली प्रोग्राम्स चलाए जाते हैं।
क्या पैरोल खत्म होने के बाद दोनों साथ रह पाएंगे?
फिलहाल नहीं।
पैरोल अवधि पूरी होने के बाद—
- दोनों को अपनी-अपनी जेल में वापस लौटना होगा
- वे कानूनी रूप से पति-पत्नी होंगे, लेकिन साथ रहना संभव नहीं होगा
- भविष्य में यदि उन्हें स्थायी रिहाई या लंबी पैरोल मिलती है, तभी वे साथ रह सकेंगे
क्या उम्रकैद का मतलब पूरी जिंदगी जेल में रहना होता है?
भारत में उम्रकैद का अर्थ आमतौर पर शेष प्राकृतिक जीवनकाल तक जेल में रहना होता है, लेकिन—
- सरकार अच्छे आचरण के आधार पर सजा में छूट दे सकती है
- रिहाई की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं होती
- सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में यह बात स्पष्ट की गई है
समाज में पुनर्वास की दिशा में एक कदम?
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मामला—
- जेल सुधार नीति के लिहाज से मील का पत्थर हो सकता है
- अपराधियों के पुनर्वास की सोच को मजबूत कर सकता है
- समाज को यह सोचने पर मजबूर कर सकता है कि “क्या हर अपराधी सुधार से परे होता है?”
मीडिया और सोशल मीडिया पर क्यों छाई यह खबर?
इस खबर के वायरल होने के कारण—
- जेल में पनपा प्यार — दुर्लभ घटना
- दो उम्रकैद दोषियों की शादी — असाधारण मामला
- हाईकोर्ट का हस्तक्षेप — कानूनी दिलचस्पी
- समाजिक और नैतिक बहस — जनचर्चा का विषय
सोशल मीडिया पर लोग इसे—
- “जेल की सलाखों के पीछे जन्मा प्यार”
- “अपराध से आगे इंसानियत की कहानी”
- “कानून और करुणा के बीच संतुलन”
जैसे शब्दों में बयान कर रहे हैं।
क्या यह भविष्य में ट्रेंड बनेगा?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार—
- हर मामला अपने तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है
- इसे सामान्य नियम नहीं बनाया जा सकता
- लेकिन यह जरूर दिखाता है कि अदालतें मानवाधिकार और सुधार की भावना को महत्व दे रही हैं
निष्कर्ष: सलाखों के पीछे भी धड़कते हैं दिल
प्रिया सेठ और हनुमान प्रसाद की यह कहानी हमें यह याद दिलाती है कि—
“अपराधी होना और इंसान होना — दोनों एक साथ संभव हैं।”
यह मामला न सिर्फ राजस्थान, बल्कि पूरे देश में जेल सुधार, मानवाधिकार और अपराधियों के पुनर्वास पर नई बहस को जन्म दे सकता है।
क्या समाज ऐसे रिश्तों को स्वीकार करेगा?
क्या यह कहानी किसी और के जीवन को बदलने की प्रेरणा बनेगी?
इन सवालों के जवाब समय देगा — लेकिन फिलहाल, यह प्रेम कहानी इतिहास बन चुकी है।