खाप पंचायत का तुगलकी फरमान: गोचर भूमि विवाद में परिवार का हुक्का-पानी बंद, मदद करने वालों पर 11 हजार का जुर्माना

Hemant Singh
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उदयपुर। देश भले ही आधुनिकता और कानून के दावों के साथ 21वीं सदी में आगे बढ़ रहा हो, लेकिन ग्रामीण इलाकों में आज भी खाप पंचायतों की मनमानी सामने आ रही है। ऐसा ही एक गंभीर और चौंकाने वाला मामला उदयपुर जिले के ओगणा थाना क्षेत्र के वीरपुरा गांव से सामने आया है, जहां खाप पंचायत ने एक ग्रामीण परिवार को सामाजिक रूप से बहिष्कृत कर कानून को खुली चुनौती दी है।

गोचर भूमि विवाद बना बहिष्कार की वजह

पीड़ित ग्रामीण का नाम रतनलाल प्रजापत है। जानकारी के अनुसार गोचर भूमि को लेकर हुए विवाद के बाद गांव की खाप पंचायत ने रतनलाल के खिलाफ तुगलकी फरमान जारी कर दिया। पंचायत ने आदेश दिया कि गांव का कोई भी व्यक्ति न तो रतनलाल के घर जाएगा और न ही उसकी दुकान से कोई सामान खरीदेगा।

इतना ही नहीं, पंचायत ने यह भी ऐलान किया कि यदि कोई व्यक्ति इस फरमान का उल्लंघन करता है, तो उस पर 11 हजार रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। इस फैसले से गांव में डर और दहशत का माहौल बन गया है।

लिखित फरमान बांटकर बनाई दहशत

मामले को और गंभीर बनाते हुए खाप पंचायत से जुड़े कुछ लोगों ने इस सामाजिक बहिष्कार को लिखित रूप में तैयार कर गांव में बांट दिया। बताया जा रहा है कि यह पूरा घटनाक्रम 24 दिसंबर का है। लिखित फरमान के बाद ग्रामीणों में डर का माहौल बन गया और लोग रतनलाल व उसके परिवार से दूरी बनाने लगे।

पुलिस में शिकायत, फिर भी कार्रवाई नहीं

सामाजिक बहिष्कार से परेशान होकर रतनलाल प्रजापत ने 26 दिसंबर को ओगणा थाने में लिखित शिकायत दर्ज करवाई। हालांकि, शिकायत दर्ज होने के कई दिन बाद भी पुलिस की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई, जिससे पीड़ित परिवार की परेशानी और बढ़ गई।

कलेक्टर और एसपी से लगाई न्याय की गुहार

पुलिस से निराश होकर रतनलाल शुक्रवार को उदयपुर जिला कलेक्ट्रेट पहुंचे। यहां उन्होंने जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन सौंपकर पूरी आपबीती बताई। पीड़ित ने अधिकारियों को बताया कि सामाजिक बहिष्कार के चलते उनका परिवार पूरी तरह टूट चुका है।

लोग डर के कारण उनसे बातचीत तक नहीं कर रहे हैं। दुकान से कोई खरीदारी नहीं कर रहा, जिससे रोज़गार पूरी तरह ठप हो गया है। इसका असर बच्चों और महिलाओं पर भी साफ दिखाई दे रहा है।

धमकियों से दहशत में परिवार

रतनलाल का आरोप है कि जब पंचायत से जुड़े लोगों को पता चला कि उन्होंने पुलिस में शिकायत की है, तो इसके बाद उन्हें धमकियां मिलनी शुरू हो गईं। इससे पूरा परिवार मानसिक तनाव और भय के माहौल में जीने को मजबूर है। पीड़ित ने आशंका जताई है कि यदि समय रहते प्रशासन ने हस्तक्षेप नहीं किया, तो कोई बड़ी अनहोनी हो सकती है।

सख्त कार्रवाई की मांग

पीड़ित ने प्रशासन से मांग की है कि खाप पंचायत के इस गैरकानूनी और अमानवीय फरमान को तुरंत रद्द किया जाए और सामाजिक बहिष्कार करने वाले लोगों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई हो। उनका कहना है कि यह मामला सिर्फ एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे समाज में कानून के राज और मानवाधिकारों का है।

सवालों के घेरे में कानून व्यवस्था

यह घटना एक बार फिर सवाल खड़े करती है कि आखिर खाप पंचायतों को किस आधार पर कानून से ऊपर समझा जा रहा है। खुलेआम सामाजिक बहिष्कार और जुर्माने जैसे फरमान जारी करना न केवल संविधान और मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि कानून व्यवस्था के लिए भी गंभीर चुनौती है।

फिलहाल पीड़ित परिवार को प्रशासन और पुलिस से न्याय की उम्मीद है, वहीं पूरे मामले पर अब जिला प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।

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